Friday, July 24, 2009

संसार का स्वरुप -एक चित्रण


एक व्यापारी जहाज़ में माल भर कर व्यापर करने विदेश को चला। अनेकों आशाएँ थी उसके मन में परन्तु भाग्य की करनी ,अचानक समुद्र में तूफ़ान आ गया -भयंकर ज्वार-भाटा उठने लगा -मूसलाधार बारिश होने लगी।यह सब देख व्यापारी बहुत घबरा गया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या होगा ?अचानक लहरों ने जहाज़ को ऊपर उछाल दिया और नीचे गिरते ही सब कुछ डूब गया। बेचारा व्यापारी व् जहाज़ कहाँ गए किसी को कुछ पता नहीं। जब सब कुछ शांत हुआ,एक तख्ते पर पड़ा सागर में बहता हुआ अचेत व्यापारी भाग्यवश किनारे पर आ गया। सूर्य की किरणों से कुछ स्फूर्ति पाकर उसने आंख खोली -समझ नहीं पाया -मैं कौन हूँ ?यहाँ कैसे और क्यों आया हूँ ?सब कुछ भूल चुका है अब वह। उसे तो नवजीवन मिला है ,गर्दन उठा चल दिया जिस ओर मुंह उठा। एक भयंकर चिंघाड़ -मुड कर देखा तो पाया एक मदमस्त,काला,भयंकर हाथी उसके पीछे दौड़ा चला आ रहा है। उसे देख वह भय से काँप गया और बोला ,"है प्रभु बचाओ "दौड़ने के अतिरिक्त और कोई चारा भी नहीं था -हाथी तो एकदम सर पर ही आ गया। उसे लगा अब जीवन असंभव है। "नहीं पथिक तूने एक बार अपनी जिव्हा से प्रभु का पवित्र नाम लिया है ,वह निरर्थक न जाएगा ,तेरी रक्षा अवश्य होगी ,"आकाशवाणी हुई। आश्चर्य से आंख उठा कर देखा तो संतोष हुआ , सामने उसे एक बड़ा भारी वट वृक्ष दिखाई दिया। आशा की किरण दिखाई दी और पुनः तेजी से भाग कर पेड़ की लटक रही शाखा को पकड़ कर लटक गया। यह देख हाथी का क्रोध और बढ़ गया और वह अपनी सूंड वृक्ष से लपेट कर उसे जोर से हिलाने लगा। पथिक डर से काँप रहा था -मन ही मन बार -बार प्रभु को याद कर बचाव की प्रार्थना करने लगा। प्रभु चिंतन कभी निष्फल नहीं जाता -अतः जैसे ही उसने मुंह ऊपर किया -उसे वहां एक मधुमक्खी का छत्ता दिखाई दिया और उसमे से टपक रही शहद की बूँद ठीक उसके खुले मुंह में आकर गिरी -आ हा हा ,कितना मधुर है यह ? डरी व् थकी हालत में मधु बिन्दु उसे अमृत सा प्रतीत हुआ। वह उसका रसपान करने में अपनी विकट स्थिति को एक क्षण के लिए भूल गया। मधु बिन्दु थोडी -थोडी देर में टपक रहे थे -अब तो वह बस उन्हीं की इंतज़ार व् चाटने में लग गया ,भूल गया वह अब प्रभु के नाम को और नीचे खड़े विकराल हाथी को ,बस मग्न है मधुबिंदु की मस्ती में। वह भले न देखे ,पर प्रभु तो देख रहे हैं। अरेरे !कितनी दयनीय है इस पथिक की दशा।हाथी पूरे वृक्ष को उखाड़ने के लिए हिला रहा है -और जिस डाल को पकड़ कर वह लटक रहा है -उसके ऊपर सफ़ेद व् काले रंग के दो चूहे बैठे उसी डाल को कुतर रहे हैं। पथिक के ठीक नीचे एक कुआँ है जिसमे चार बड़े -बड़े अजगर मुंह फाड़े ऊपर उठे हुए हैं इस प्रतीक्षा में कि कब यह पथिक नीचे गिरे और हम इसे खा कर अपनी भूख मिटाएँ। अचानक वृक्ष बड़ी जोर से हिला -जिससे छत्ते में बैठी मधुमक्खियाँ निकल कर बाहर आ गई और पथिक को जगह -जगह चिपक कर काटने लगी ,डंकों की पीड़ा से घबरा गया ,तिलमिलाने लगा -दुःख के कारण फिर प्रभु याद आए ,"प्रभु बचाओ -बचाओ कि ध्वनि निकालने लगा। लकिन इस बीच भी मधु की बूँद आने पर उसे चाटना नहीं छोड़ रहा था और उसके स्वाद में दुःख पीड़ा को भूल रहा था। विमान में सवार परम करुणाधारी गुरुदेव उसकी अत्यन्त दयनीय स्थिति देख वहां पधारे और उसे संसार की स्थिति का बोध कराया। कहा ,"हाथी रूप काल वृक्ष को हिला रहा है ,सफ़ेद काले चूहे दिन और रात रूप तेरी आयु को कुतर कर ख़त्म कर रहे हैं ,मधुमक्खियों रूप परिवारजन तुझे पीड़ा दे रहे हैं ,चार अजगर नरक ,तिर्यंच ,देव व् मनुष्य गति रूप मुंह फाड़े तुझे खा जाने को खड़े हैं। संसार के सुखाभास रूप मधु बिन्दु तेरे मुंह में गिर रहे हैं। तू इस सुखाभास के लालच में मत फंस ,तेरा अंत शीघ्र ही निश्चित है ,तुझे कोई भी बचा नहीं सकता परन्तु तुने प्रभु का नाम लिया है ,वह निष्फल नहीं गया। करुणाधारी प्रभु ने मुझे भेजा है तुझे बचाने के लिए। बस यही एक मार्ग है तेरे बचने का अतः आ हाथ बढ़ा मैं तुझे विमान में बिठा कर ले जाऊंगा और सांसारिक दुखों व् झूठे सुखाभासों से छुडा कर स्थाई सुख में ले जाऊंगा। परन्तु पथिक सोचने लगा यहाँ तो मिल रहा है मधुबिंदु ,और गुरुदेव के पास है भूख ,प्यास ,गर्मी -सर्दी व् अनेकों संकट। कौन मूर्ख जाए इनके साथ ?और मधुपान करने में फिर से मग्न हो गया। गुरुदेव चले गए -डाली कटी और मधुबिंदु की मस्ती को हृदय में लिए अजगर के मुंह में जा कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी।
कथा कुछ रोचक लगी आपको ?पर जानते हो किसकी कहानी है ?आपकी और मेरी सबकी आत्मकथा है यह। आप हँसते हैं उस पथिक की मूर्खता पर ,काश हँस लेते एक बार अपनी मूर्खता पर भी। -अनादि काल से कितनी बार मेरा जहाज़ रुपी शरीर ,परिवार रुपी सामान सहित इस भव सागर में डूबा है -बार -बार जन्म लेने पर मैं भूल जाता हूँ -मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ?कहाँ जाना है ? कुछ पता नहीं चलता।
बस इसी तरह मैं स्वयं को बचाता हुआ किसी वृक्ष (घर )का सहारा लेता हूँ --वहां दिन -रात रुपी चूहे मेरी आयु घटाते रहते हैं --मधु रस रुपी सांसारिक सुखाभासों में खो जाता हूँ --परिवार जन मधुमक्खी रूप डंक मारते (दुःख )देते हैं --फिर भी चेतता नहीं --संसार के कभी -कभी मिलने वाले अस्थाई सुख को ही असली सुख मान जीता रहता हूँ।
फिर भी प्रभु इस संसार चक्रव्यूह से निकालने के लिए आते हैं --पर मैं कभी भी उनके साथ नहीं जाता --इसी कारण कभी भी ख़त्म न होने वाले इस संसार चक्र में अनादि काल से घूम रहा हूँ।
यदि मैं कभी भी गुरुओं की शरण में चला जाऊँ तो देखना वहां पर परम सुख और स्थाई आनंद ही आनंद है ,जिसे पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊंगा और सदा -सदा के लिए जन्म -मरण के दुखों से छूट जाऊंगा और एक दिन प्रभु सम हो जाऊंगा --------------बस देर है तो सिर्फ़ दृढ़ निशचय कर गुरु (प्रभु)की शरण में जाने तक की -------!

1 comment:

  1. Ammaji mujhe yeh kahani bahut achi lagi.Yeh bahut intresting hai.Apne ek kahani mein puri life aur usme rehne wale lalchi logo ke baara mei bta diya.

    NAMASTE.....

    ReplyDelete