Thursday, July 16, 2009

सहनशीलता और सेवा -एक मिसाल

राजा उदायन और उसकी रानी प्रभावती बहुत धर्मात्मा ,दानी व सदाचारी थे। उनके ऐसे आचरण से उनकी प्रजा बहुत सुख व समृद्धि का जीवन जी रही थी। राजा में एक ओर विशेष गुण था कि वह किसी की भी सेवा करने में सदा तत्पर रहता था। सेवा में तन - मन व धन सब कुछ सहर्ष अर्पण कर देता था। किसी रोगी की सेवा करने में तो उसे विशेष सुख मिलता था। रोगी की सेवा ,राजा होते हुए भी वह स्वयं अपने हाथों से बिना किसी संकोच व ग्लानी के भावः से ,करके बड़ी शान्ति का अनुभव करता था। एक बार एक जैन दिगम्बर मुनिराज राजा के राज्य में पधारे। उन्हें भयंकर कोढ़ का रोग लगा हुआ था। उनके शरीर से जगह जगह से खून टपक रहा था व दुर्गन्ध भी आ रही थी। ऐसे मुनि को देख कर कोई भी प्रजा का व्यक्ति उनके पास नहीं जा रहा था। यह सूचना राजा तक पहुँची ,सुनते ही राजा स्वयं मुनि राज के दर्शन करने के लिए गया। वहां जाकर पूर्ण भक्ति सहित वंदना कर अपने महल में पधारने व भोजन करने की प्रार्थना की (मुनि श्री का नवधा भक्ति से पढ़गाहन किया )मुनि श्री ने राजा की प्रार्थना स्वीकार की और राजमहल में पहुँच गए। राजा और रानी नें उन्हें पूर्ण विधि सहित भोजनशाला में उच्च आसन दिया व भोजन करवाना शुरू किया ,भोजन करते करते मुनि श्री को वमन (उल्टी) हो गया ,जिससे राजा के सारे वस्त्र ख़राब हो गए ,साथ ही दुर्गन्ध भी उठने लगी। परन्तु राजा व रानी को जरा भी ग्लानी नहीं हुई बल्कि मन ही मन वे सोचने लगे ,"ओह !हमने आहार में न जाने क्या खिला दिया जो मुनिराज को हज़म नहीं हो पाया ,इसी कारण हमारी गलती से वमन हो गया है। " राजा बड़े करुणा भावः से मुनि श्री का शरीर साफ़ करने लगा। रानी नीचे झुक कर फर्श साफ़ करने लगी ,लेकिन तभी मुनि श्री ने फ़िर वमन कर दिया और सारा दुर्गंधित वमन रानी के ऊपर गिर गया। पर देखो -सहनशीलता की पराकाष्ठा व ग्लानी रहित भावना की दृढ़ता। रानी ने एक बार भी मुँह -नाक बंद करके घृणा नहीं की बल्कि दोनों हाथ जोड़ कर मुनि श्री से अपनी अनजाने में हुई गलती की क्षमा मांगने लगे। ऐसी स्थिति को देख कर एक दम एक चमत्कार हुआ। मुनि श्री का रूप बदल कर वहां एक सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित देव प्रगट हो गया और राजा और रानी को प्रणाम कर कहने लगा ,"मैं हूँ स्वर्ग का इन्द्र ,आपकी परीक्षा लेने हेतु मुनिराज का रूप धर कर यहाँ आया था। आप दोनों सच मुच महान हैं। मैंने सुना था कि धरती पर आप जैसा सहनशील और सेवा करने वाला व्यक्ति अन्य कोई नहीं यह बात सच मुच सत्य निकली। राजन तुम सदा सब राजाओं में शिरोमणि रहोगे। "ऐसा कह कर इन्द्र स्वर्ग लोक को लौट गया। राजा ने अनेक वर्षों तक सुख पूर्वक राज्य व संसार के सुखों का उपभोग किया। अंत में वैराग्य धारण कर तप साधना द्वारा दीक्षा ग्रहण करके मोक्ष पद को प्राप्त किया।

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