Thursday, July 23, 2009
स्थितिकरण
एक मंत्री का बेटा पुष्प बड़ा धर्मात्मा था और दान- पूजा व्रत आदि अनेक सद कर्मों को करने में सदा सबसे अधिक रुचि लेता था। एक बार उनके राज्य में मुनि वारिशैन पधारे। उनके आगमन की सूचना से पुष्प बड़ा प्रसन्न हुआ तथा उन्हें आहार देने हेतु पढ़गाहन किया व् पूर्ण विधि सहित आहार कराया। आहार के बाद जब मुनि वापिस वन को जाने लगे तो पुष्प उन्हें कुछ दूर तक छोड़ने जाने के लिए उनके साथ चलने लगा। थोडी देर पश्चात् बाकि सब लोगों को तो मुनि श्री ने वापिस जाने को कह दिया परन्तु पुष्प को कुछ नहीं कहा। पुष्प मन ही मन सोचने लगा कि मुनि श्री मुझे वापिस जाने को क्यों नहीं कह रहे ?अगर बिना कहे मैं वापिस मुड़ जाऊँ तो यह मुनि श्री की अविनय होगी। पुष्प को अपनी पत्नी से बहुत प्रेम था उसे लगा पत्नी मेरी राह देख रही होगी। मुनि श्री को अपने ज्ञान से पुष्प में एक ऐसी आत्मा के दर्शन हो रहे थे जो दीक्षा धारण कर अपना कल्याण कर सकता है। इसी विचार के कारण मुनि श्री पुष्प को वैराग्य की बातें बताने लगे। संसार की असारता व् मनुष्य जन्म की सार्थकता हेतु दीक्षा का महत्व बताने लगे। पुष्प धर्मात्मा तो था ही उसके मन में भी वैराग्य भावः जागृत हो गया। मुनि श्री के कहने पर उसने मुनि श्री से दीक्षा ग्रहण कर ली। अब पुष्प मुनि हो गया और वारिशैन मुनि के साथ रह कर शास्त्रों का अध्यन करने लगा व् संयम से जीवन जीने लगा परन्तु अब भी उसे कभी कभी अपनी पत्नी की बहुत याद आती थी। साधना के पथ पर चलते उन्हें 12 वर्ष बीत गए। एक बार विहार के दौरान रास्ते में मुनि पुष्प को प्रवचन के कुछ शब्द सुने जिसमें काम वासना बुरी है का वर्णन चल रहा था। मुनि पुष्प का मन अपनी पत्नी को याद करके अधीर हो गया और उससे मिलने की इतनी तीव्र इच्छा जाग गई कि वह एक दम अपने घर की ओर मुड़ गए। मुनि वारिशैन उनकी मनः स्थिति को जान कर ,उसे धर्म से डिगता देख ,उसे धर्म में दृड़ करने हेतु उसके साथ चल पड़े। दोनों नगर में मुनि वारिशैन के घर पहुँच गए। उनकी माता चेलना नें दोनों के लिए दो पाटे एक लकड़ी का और एक रत्नजडित बिछाया। वारिशैन मुनि लकड़ी के पाटे पर बैठ गए और कहने लगे ,"मेरी सारी स्त्रियों को यहाँ बुला दो "। माता ने वैसा ही किया। उनकी सारी स्त्रियाँ खूब सज धज कर उनके आदेश का पालन करने हेतु आकर खड़ी हो गई। सभी देव कन्याओं से भी अधिक सुंदर थी। मुनि वारिशैन ने मुनि पुष्प से कहा ,"यह मेरी सब स्त्रियाँ ,पूरा राज्य व् धन संपत्ति तुम स्वीकार कर लो। "मुनि श्री से ऐसे वचन सुन मुनि पुष्प बहुत लज्जित हुए और अपनी मूर्खता पर बड़ा खेद हुआ। मुनि श्री के चरणों में गिर कर वह क्षमा मांगने लगे। कहने लगे कि हे मुनिराज स्त्री प्रेम में फंस कर मैं धर्मरत्न को न पहचान सका। दया करके मुझे मेरे इस कृत्य का प्रायशचित दीजिये। गुरुदेव तो उसके साथ आए ही उसे धर्म में दृड़ कराने के लिए थे। अतः उन्होनें मुनि पुष्प को अपने साथ वापिस चलने को कहा। अब मुनि पुष्प नें गुरुदेव के साथ रह कर कठोर तप साधना के द्वारा धर्म मार्ग पर चलते हुए अपनी आत्मा का कल्याण किया और दुनिया के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत किया।
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