Wednesday, August 12, 2009

आंतरिक भावों की समीक्षा


एक बार छः मित्र पिकनिक मनाने निकलेसुहावना मौसम था। चारों और प्रकृति अपनी अपार सुन्दरता बिखेर रही थीसभी मित्र हँसते ,गुनगुनाते मस्ती में प्रकृति का आंनंद लेते चले जा रहे थेअचानक वे खुशी से झूम उठे और बोले ," हा हा हा कितना सुंदर आम का वृक्ष है !वाह- वाह काम बन गया ,अब तो जी भरकर आम खायेंगे ,खूब मज़ा आयेगाआम से लदे वृक्ष को देख कर छहों मित्रों के मन में अलग -अलग विचार उठने लगेउनमें से एक कहीं से एक कुल्हाडी उठा लाया और उसे लेकर वह वृक्ष पर चढ़ गया और आमों से लदफ़द एक टहनी को काटने लगायह देख दूसरा मित्र उसकी मूर्खता पर हंसने लगा और बोला ,"अरे मूर्ख !क्यों अपना परीश्रम व्यर्थ खोता है ?इस टहनी से ज़्यादा तो इस बड़े टहने में सैंकडों आम लगे हैं ,एक बार इसे नीचे गिरा लो ,फ़िर जी भरकर खाओ और साथ में घर भी बाँध कर ले जाओ। "यह बात सुन कर तीसरा मित्र अपनी हँसी रोक सका औरबोला ,"अरे भोले भाई !यदि आम घर भी ले जाने हैं तो नीचे मैं तुझे ओर भी सरल उपाय बताता हूँवृक्ष पर चढ़ने से तो चोट लगने का भी खतरा हैनीचे खड़े होकर वृक्ष को जड़ से ही काट डालो ,सारा वृक्ष ही गिर जाएगा फ़िर आराम से पेट भर कर खा भी लेंगे और घर भी ले जायेंगेऔर हाँ भइया !मैं तो बैलगाड़ी भर कर सारा ही वृक्ष लाद कर घर ले जाऊँगाकई दिन तो आम खाऊँगा और साल भर इंधन में रोटी पकाऊंगा। बैलगाडी वाला अधिक से अधिक 100-200 रुपए ही तो लेगा। "ऐसा कह कर वह वृक्ष को जड़ से उखाड़ने के लिए कुल्हाडी चलाने लगा । शेष तीन मित्र यह सब देख मन ही मन सोचने लगे कि बेकार ही आए इन दुष्ट मित्रों के साथ। जिसका फल खायेंगे उसको ही जड़ से काट डालेंगे !धिक्कार है ऐसी कृतघ्नता को। प्रभु ही इन्हें सदबुद्धि प्रदान करें ।
साहस बटोर कर उनमें से एक बोला ,"ठहरो !पहले मेरी बात सुन लो फ़िर वृक्ष काटना। एक बार एक शेर दलदल में फंस गया बेचारा लाचार हो गया। जिसकी एक दहाड़ से सारा जंगल काँपता था वह बेचारा भगवान से प्रार्थना कर रहा है कि एक बार बचा लो फ़िर मैं किसी को नहीं मारूंगा ,घास पत्ते खा कर जी लूँगा। प्रभु का नाम कभी व्यर्थ नहीं जाता ,तभी एक पथिक वहां से गुजरा और शेर की हालत देख कर उस पे दया करके उसे दलदल से बाहर निकाल देता है और मन में सोचता है कि शेर उसका उपकार मानेगा। परन्तु शेर बाहर आते ही उसे कहता है कि मैं तुझे खा जाऊंगा। यह सुन पथिक घबरा जाता है और प्रभु को याद करता है ,फलस्वरूप उसे एक विचार आता है और वह शेर से कहता है कि मैंने तो तुझे बचाया और तू मुझे ही खा जाएगा !शेर बोला ,"दुनिया का ऐसा ही व्यवहार है। "पथिक बोला ,"अच्छा भाई ,किसी से न्याय करा लेते हैं। व्यवहार कुशल शेर ने यह बात सहर्ष स्वीकार कर ली क्योंकि उसे विश्वास था कि न्याय उसके विरुद्ध न जा सकेगा क्योंकि वह जानता था कि मनुष्य से अधिक कृतघनी संसार में कोई नहीं है। दोनों एक वृक्ष के पास पहुंचे और उसे सारी बात बताई। वृक्ष बोला ,"शेर ठीक है क्योंकि मनुष्य गर्मी से परेशान होकर मेरे साये में विश्राम करता है ,मेरे फलों को खाता है ,फ़िर भी जाते हुए मेरी टहनी तोड़ कर ले जाता है उसे चूल्हे में जलाता है। अतः इस कृत्घनी के साथ ऐसा ही व्यवहार होना चाहिए । पथिक निराश होकर आगे चला तो एक गाय मिली उसको भी अपनी कथा सुनाई । गाय भी पथिक के ही विरुद्ध बोली। कहने लगी ,"मैंने जवानी में अपने बच्चों का पेट काट कर मनुष्य की संतान को दूध पिलाया परन्तु बूढी होने पर इस निर्दयी ने मेरा उपकार भुला ,मुझे कसाई को बेच ,मेरी खाल खिंचवा कर जूता बनवा कर पाँव में पहन लिया। ऐसे कृत्घनी के साथ ऐसा ही व्यवहार उचित है। निर्णय पाकर शेर पथिक को खा गया। इस लिए मित्रों विवेक से काम लो और जैसे तुम दूसरे की कृतघ्नता को देखते हो वैसे ही अपनी भी देखो।जिस वृक्ष के तुम आम खाओगे उसी पर कुल्हाडी चलाते क्या तुम्हारा हृदय नहीं काँप रहा ?मैं तुम्हारे पाँव पड़ता हूँ तुम सब नीचे उतर आओ। मैं स्वयं वृक्ष पर चढ़ कर तुम्हें भर पेट आम खिला दूँगा। ऐसा कह कर वह ऊपर चढ़ गया और आम के बड़े -बड़े गुच्छे तोड़ कर नीचे डालने लगा। यह देख नीचे खड़ा एक मित्र बोला ,"मित्र !तुम्हें भी पूरा विवेक नहीं ,देख नहीं रहे हो ,जिस गुच्छे को तोड़ कर तुम नीचे फैंक रहे हो उसमे पके हुए आमों के साथ -साथ कच्चे आम भी टूट रहे हैं। यह कच्चे आम कुछ दिन में पक जाते और किसी अन्य व्यक्ति के खाने में काम आ जाते परन्तु अब तो तुमने ये व्यर्थ कर दिए हैं। ये न तो अब तुम्हारे काम आएंगे न किसी अन्य के। तुम अब नीचे उतर आओ मैं तुम सबको ऊपर चढ़ कर एक -एक पका हुआ मीठा आम खिलाता हूँ। यह कह कर वह वृक्ष पर चढ़ गया और चुन -चुन कर एक -एक मीठा आम तोड़ कर नीचे गिराने लगा।
छठा मित्र नीचे खड़ा अब तक यह सब दृश्य देख रहा था परन्तु चुप था। क्या बोले ?किस -किस को समझाए ?उस की संतोष पूर्ण सोच को स्वीकार करने वाला यहाँ था ही कौन ?विद्वान लोग मूर्खों को उपदेश नहीं देते क्योंकि एक दिन की बात है बहुत ज़ोर से वर्षा हो रही थी। वृक्ष के नीचे कुछ बन्दर ठिठुरे बैठे थे। उसी वृक्ष पर कुछ बयों ने घोंसले बना रखे थे और आनंद से प्रकृति का मज़ा ले रहे थे। बंदरों की हालत देख कर वे हँसते हुए बोले ,"मूर्ख बन्दर तुम्हें भगवान् ने दो हाथ दिए हैं फ़िर भी तुम अपना घर क्यों नहीं बनाते ?देखो हम छोटे -छोटे पक्षी भी कितने सुंदर घोंसलों में रहते हैं। क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती ?बस इतना सुनते ही बंदरों ने गुस्से में वृक्ष पर चढ़ कर सब बयों के घोंसले तोड़ दिए और उनके अंडे भी फोड़ दिए। ऐसा सोच कर वह संतोषी व्यक्ति कुछ न बोला और पृथ्वी पर पहले से इधर -उधर बिखरे पड़े हुए पके आमों को उठा कर पृथक बैठ सुख पूर्वक खाने लगा।
इस उदाहरण से व्यक्ति की इच्छाओं की तीव्रता व् मंदता का सुंदर परिचय मिलता है। इसी प्रकार अपने आंतरिक भावों का दर्शन करते हुए तीव्र भावों से पीछे हटते हुए मंद्तम भावों पर अर्थात पहले मित्र के भावों से छठे मित्र के भावों तक आने के क्रम में ही सार्थकता है और इसी में ही कल्याण है --------यही धर्म है।
इसी तरह मन में उठ रहे भावों को हमें पढ़ना होगा और देखना होगा अपने भीतर ,ठीक -ठीक पहचानना होगा अपने भीतर। खाते -नहाते -चलते -सोते हर समय जागरूक रहना होगा अपने भीतर। देखते रहना होगा प्रतिक्षण अपने मन एवं बुद्धि को कि क्या कुछ विचार रहे हैं ये ?क्या जाल बुन रहे हैं ये ?प्रतिक्षण समझना होगा ताकि हम भटकने पायें।
यही होगी हमारी आंतरिक साधना -----------------!

Tuesday, August 11, 2009

धैर्य -एक कसौटी

धर्मपुर नगरी का राजा बहुत पराक्रमी और धर्मप्रिये था। उसकी कीर्ति चारों दिशाओं में फैली हुई थी लेकिन साथ ही साथ वह बहुत जिद्दी था। एक बार राजा ने शाही जोहरिओं को दरबार में बुला कर उनसे कहा कि मुझे अभी इसी समय हीरे की परख करना सिखा दो ,नहीं तो प्राण दंड भुगतने को तैयार हो जाओ। यह सुन जोहरिओं के पांव तले की धरती ही खिसक गई। वे सोचने लगे एक ही पल में हीरे की परख राजा को कैसे सिखाएँ ?तभी एक वृद्ध अनुभवी जोहरी आगे बढ़ा और बोला ,"मैं राजा को सिखाऊंगा ,पर मेरी एक शर्त है। राजा जी वचन दो तो कहूँ। "राजा बोला ,"हाँ हाँ मैं तैयार हूँ ,मांगो क्या मांगते हो ?कोशाधयक्ष !दे दो जोहरी को लाख -करोड़ जो भी इसे चाहिए । "जोहरी बोला ,"राजन मुझे धन नहीं चाहिए बल्कि जिज्ञासा है राजनीति सीखने की ,और वह भी अभी इसी समयं। आप शर्त पूरी कीजिये और हीरे की परख की विद्या ले लीजिये । "राजा बोला ,"परन्तु यह कैसे सम्भव है ?राजनीति सीखने के लिए तुम्हे वर्षों हमारे मंत्री के पास रहना पड़ेगा। "यह बात सुन जोहरी बोला ,"बस तो हीरे की परख की विद्या भी आपको बरसों मेरी दुकान पर रह कर ही मिलेगी। "जोहरी की बात सुन कर राजा को सदबुद्धि आ गई।
इसी प्रकार धर्म सम्बन्धी बात को कोई थोडी ही देर में सुनना व् सीखना चाहे तो यह बात असंभव है। उसे वर्षों रहना पड़ेगा ज्ञानी के संग में ,वर्षों सुनना होगा उसके विवेचन को -------।

Friday, July 24, 2009

संसार का स्वरुप -एक चित्रण


एक व्यापारी जहाज़ में माल भर कर व्यापर करने विदेश को चला। अनेकों आशाएँ थी उसके मन में परन्तु भाग्य की करनी ,अचानक समुद्र में तूफ़ान आ गया -भयंकर ज्वार-भाटा उठने लगा -मूसलाधार बारिश होने लगी।यह सब देख व्यापारी बहुत घबरा गया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या होगा ?अचानक लहरों ने जहाज़ को ऊपर उछाल दिया और नीचे गिरते ही सब कुछ डूब गया। बेचारा व्यापारी व् जहाज़ कहाँ गए किसी को कुछ पता नहीं। जब सब कुछ शांत हुआ,एक तख्ते पर पड़ा सागर में बहता हुआ अचेत व्यापारी भाग्यवश किनारे पर आ गया। सूर्य की किरणों से कुछ स्फूर्ति पाकर उसने आंख खोली -समझ नहीं पाया -मैं कौन हूँ ?यहाँ कैसे और क्यों आया हूँ ?सब कुछ भूल चुका है अब वह। उसे तो नवजीवन मिला है ,गर्दन उठा चल दिया जिस ओर मुंह उठा। एक भयंकर चिंघाड़ -मुड कर देखा तो पाया एक मदमस्त,काला,भयंकर हाथी उसके पीछे दौड़ा चला आ रहा है। उसे देख वह भय से काँप गया और बोला ,"है प्रभु बचाओ "दौड़ने के अतिरिक्त और कोई चारा भी नहीं था -हाथी तो एकदम सर पर ही आ गया। उसे लगा अब जीवन असंभव है। "नहीं पथिक तूने एक बार अपनी जिव्हा से प्रभु का पवित्र नाम लिया है ,वह निरर्थक न जाएगा ,तेरी रक्षा अवश्य होगी ,"आकाशवाणी हुई। आश्चर्य से आंख उठा कर देखा तो संतोष हुआ , सामने उसे एक बड़ा भारी वट वृक्ष दिखाई दिया। आशा की किरण दिखाई दी और पुनः तेजी से भाग कर पेड़ की लटक रही शाखा को पकड़ कर लटक गया। यह देख हाथी का क्रोध और बढ़ गया और वह अपनी सूंड वृक्ष से लपेट कर उसे जोर से हिलाने लगा। पथिक डर से काँप रहा था -मन ही मन बार -बार प्रभु को याद कर बचाव की प्रार्थना करने लगा। प्रभु चिंतन कभी निष्फल नहीं जाता -अतः जैसे ही उसने मुंह ऊपर किया -उसे वहां एक मधुमक्खी का छत्ता दिखाई दिया और उसमे से टपक रही शहद की बूँद ठीक उसके खुले मुंह में आकर गिरी -आ हा हा ,कितना मधुर है यह ? डरी व् थकी हालत में मधु बिन्दु उसे अमृत सा प्रतीत हुआ। वह उसका रसपान करने में अपनी विकट स्थिति को एक क्षण के लिए भूल गया। मधु बिन्दु थोडी -थोडी देर में टपक रहे थे -अब तो वह बस उन्हीं की इंतज़ार व् चाटने में लग गया ,भूल गया वह अब प्रभु के नाम को और नीचे खड़े विकराल हाथी को ,बस मग्न है मधुबिंदु की मस्ती में। वह भले न देखे ,पर प्रभु तो देख रहे हैं। अरेरे !कितनी दयनीय है इस पथिक की दशा।हाथी पूरे वृक्ष को उखाड़ने के लिए हिला रहा है -और जिस डाल को पकड़ कर वह लटक रहा है -उसके ऊपर सफ़ेद व् काले रंग के दो चूहे बैठे उसी डाल को कुतर रहे हैं। पथिक के ठीक नीचे एक कुआँ है जिसमे चार बड़े -बड़े अजगर मुंह फाड़े ऊपर उठे हुए हैं इस प्रतीक्षा में कि कब यह पथिक नीचे गिरे और हम इसे खा कर अपनी भूख मिटाएँ। अचानक वृक्ष बड़ी जोर से हिला -जिससे छत्ते में बैठी मधुमक्खियाँ निकल कर बाहर आ गई और पथिक को जगह -जगह चिपक कर काटने लगी ,डंकों की पीड़ा से घबरा गया ,तिलमिलाने लगा -दुःख के कारण फिर प्रभु याद आए ,"प्रभु बचाओ -बचाओ कि ध्वनि निकालने लगा। लकिन इस बीच भी मधु की बूँद आने पर उसे चाटना नहीं छोड़ रहा था और उसके स्वाद में दुःख पीड़ा को भूल रहा था। विमान में सवार परम करुणाधारी गुरुदेव उसकी अत्यन्त दयनीय स्थिति देख वहां पधारे और उसे संसार की स्थिति का बोध कराया। कहा ,"हाथी रूप काल वृक्ष को हिला रहा है ,सफ़ेद काले चूहे दिन और रात रूप तेरी आयु को कुतर कर ख़त्म कर रहे हैं ,मधुमक्खियों रूप परिवारजन तुझे पीड़ा दे रहे हैं ,चार अजगर नरक ,तिर्यंच ,देव व् मनुष्य गति रूप मुंह फाड़े तुझे खा जाने को खड़े हैं। संसार के सुखाभास रूप मधु बिन्दु तेरे मुंह में गिर रहे हैं। तू इस सुखाभास के लालच में मत फंस ,तेरा अंत शीघ्र ही निश्चित है ,तुझे कोई भी बचा नहीं सकता परन्तु तुने प्रभु का नाम लिया है ,वह निष्फल नहीं गया। करुणाधारी प्रभु ने मुझे भेजा है तुझे बचाने के लिए। बस यही एक मार्ग है तेरे बचने का अतः आ हाथ बढ़ा मैं तुझे विमान में बिठा कर ले जाऊंगा और सांसारिक दुखों व् झूठे सुखाभासों से छुडा कर स्थाई सुख में ले जाऊंगा। परन्तु पथिक सोचने लगा यहाँ तो मिल रहा है मधुबिंदु ,और गुरुदेव के पास है भूख ,प्यास ,गर्मी -सर्दी व् अनेकों संकट। कौन मूर्ख जाए इनके साथ ?और मधुपान करने में फिर से मग्न हो गया। गुरुदेव चले गए -डाली कटी और मधुबिंदु की मस्ती को हृदय में लिए अजगर के मुंह में जा कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी।
कथा कुछ रोचक लगी आपको ?पर जानते हो किसकी कहानी है ?आपकी और मेरी सबकी आत्मकथा है यह। आप हँसते हैं उस पथिक की मूर्खता पर ,काश हँस लेते एक बार अपनी मूर्खता पर भी। -अनादि काल से कितनी बार मेरा जहाज़ रुपी शरीर ,परिवार रुपी सामान सहित इस भव सागर में डूबा है -बार -बार जन्म लेने पर मैं भूल जाता हूँ -मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ ?कहाँ जाना है ? कुछ पता नहीं चलता।
बस इसी तरह मैं स्वयं को बचाता हुआ किसी वृक्ष (घर )का सहारा लेता हूँ --वहां दिन -रात रुपी चूहे मेरी आयु घटाते रहते हैं --मधु रस रुपी सांसारिक सुखाभासों में खो जाता हूँ --परिवार जन मधुमक्खी रूप डंक मारते (दुःख )देते हैं --फिर भी चेतता नहीं --संसार के कभी -कभी मिलने वाले अस्थाई सुख को ही असली सुख मान जीता रहता हूँ।
फिर भी प्रभु इस संसार चक्रव्यूह से निकालने के लिए आते हैं --पर मैं कभी भी उनके साथ नहीं जाता --इसी कारण कभी भी ख़त्म न होने वाले इस संसार चक्र में अनादि काल से घूम रहा हूँ।
यदि मैं कभी भी गुरुओं की शरण में चला जाऊँ तो देखना वहां पर परम सुख और स्थाई आनंद ही आनंद है ,जिसे पाकर मैं कृतकृत्य हो जाऊंगा और सदा -सदा के लिए जन्म -मरण के दुखों से छूट जाऊंगा और एक दिन प्रभु सम हो जाऊंगा --------------बस देर है तो सिर्फ़ दृढ़ निशचय कर गुरु (प्रभु)की शरण में जाने तक की -------!

Thursday, July 23, 2009

स्थितिकरण

एक मंत्री का बेटा पुष्प बड़ा धर्मात्मा था और दान- पूजा व्रत आदि अनेक सद कर्मों को करने में सदा सबसे अधिक रुचि लेता था। एक बार उनके राज्य में मुनि वारिशैन पधारे। उनके आगमन की सूचना से पुष्प बड़ा प्रसन्न हुआ तथा उन्हें आहार देने हेतु पढ़गाहन किया व् पूर्ण विधि सहित आहार कराया। आहार के बाद जब मुनि वापिस वन को जाने लगे तो पुष्प उन्हें कुछ दूर तक छोड़ने जाने के लिए उनके साथ चलने लगा। थोडी देर पश्चात् बाकि सब लोगों को तो मुनि श्री ने वापिस जाने को कह दिया परन्तु पुष्प को कुछ नहीं कहा। पुष्प मन ही मन सोचने लगा कि मुनि श्री मुझे वापिस जाने को क्यों नहीं कह रहे ?अगर बिना कहे मैं वापिस मुड़ जाऊँ तो यह मुनि श्री की अविनय होगी। पुष्प को अपनी पत्नी से बहुत प्रेम था उसे लगा पत्नी मेरी राह देख रही होगी। मुनि श्री को अपने ज्ञान से पुष्प में एक ऐसी आत्मा के दर्शन हो रहे थे जो दीक्षा धारण कर अपना कल्याण कर सकता है। इसी विचार के कारण मुनि श्री पुष्प को वैराग्य की बातें बताने लगे। संसार की असारता व् मनुष्य जन्म की सार्थकता हेतु दीक्षा का महत्व बताने लगे। पुष्प धर्मात्मा तो था ही उसके मन में भी वैराग्य भावः जागृत हो गया। मुनि श्री के कहने पर उसने मुनि श्री से दीक्षा ग्रहण कर ली। अब पुष्प मुनि हो गया और वारिशैन मुनि के साथ रह कर शास्त्रों का अध्यन करने लगा व् संयम से जीवन जीने लगा परन्तु अब भी उसे कभी कभी अपनी पत्नी की बहुत याद आती थी। साधना के पथ पर चलते उन्हें 12 वर्ष बीत गए। एक बार विहार के दौरान रास्ते में मुनि पुष्प को प्रवचन के कुछ शब्द सुने जिसमें काम वासना बुरी है का वर्णन चल रहा था। मुनि पुष्प का मन अपनी पत्नी को याद करके अधीर हो गया और उससे मिलने की इतनी तीव्र इच्छा जाग गई कि वह एक दम अपने घर की ओर मुड़ गए। मुनि वारिशैन उनकी मनः स्थिति को जान कर ,उसे धर्म से डिगता देख ,उसे धर्म में दृड़ करने हेतु उसके साथ चल पड़े। दोनों नगर में मुनि वारिशैन के घर पहुँच गए। उनकी माता चेलना नें दोनों के लिए दो पाटे एक लकड़ी का और एक रत्नजडित बिछाया। वारिशैन मुनि लकड़ी के पाटे पर बैठ गए और कहने लगे ,"मेरी सारी स्त्रियों को यहाँ बुला दो "। माता ने वैसा ही किया। उनकी सारी स्त्रियाँ खूब सज धज कर उनके आदेश का पालन करने हेतु आकर खड़ी हो गई। सभी देव कन्याओं से भी अधिक सुंदर थी। मुनि वारिशैन ने मुनि पुष्प से कहा ,"यह मेरी सब स्त्रियाँ ,पूरा राज्य व् धन संपत्ति तुम स्वीकार कर लो। "मुनि श्री से ऐसे वचन सुन मुनि पुष्प बहुत लज्जित हुए और अपनी मूर्खता पर बड़ा खेद हुआ। मुनि श्री के चरणों में गिर कर वह क्षमा मांगने लगे। कहने लगे कि हे मुनिराज स्त्री प्रेम में फंस कर मैं धर्मरत्न को न पहचान सका। दया करके मुझे मेरे इस कृत्य का प्रायशचित दीजिये। गुरुदेव तो उसके साथ आए ही उसे धर्म में दृड़ कराने के लिए थे। अतः उन्होनें मुनि पुष्प को अपने साथ वापिस चलने को कहा। अब मुनि पुष्प नें गुरुदेव के साथ रह कर कठोर तप साधना के द्वारा धर्म मार्ग पर चलते हुए अपनी आत्मा का कल्याण किया और दुनिया के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत किया।

Saturday, July 18, 2009

इंसान जन्म से नहीं -कर्म से महान होता है

राजा महाबल धार्मिक उत्सवों को बड़ी धूम धाम से मनाया करता था। नन्दीश्वर पर्व में अष्टमी के दिन राजा ने घोषणा करवाई कि आज से आठ दिन तक कोई भी किसी जीव की हिंसा नहीं करेगा। अगर कोई ऐसा करेगा तो उसे प्राण दंड दिया जाएगा। उस राजा का पुत्र कुमारबल मॉस खाने का आदि था। उससे आठ दिन तक मॉस खाए बिना नहीं रहा गया अतः एक दिन अपने बगीचे में छिप कर एक बकरे को मरवा कर तथा पकवा कर उसने खा लिया। बगीचे का माली उस समय पेड पर चढा हुआ था। उसने यह सब देख लिया और राजा को सारीबात बता दी। राजा को बहुत क्रोध आया कि मेरी आज्ञा की मेरे ही बेटे ने अवहेलना की है। घोषणा के अनुसार राजा ने अपने बेटे बल कुमार को प्राण दंड की सज़ा सुनाई। बल कुमार को मृत्युदंड के स्थान पर ले जाया गया और चांडाल को बुलाने के लिए एक सिपाही उसके घर गया। चांडाल को सारी सूचना मिल गई थी उसने अपनी पत्नी से कहा ,"सिपाही से कह देना मैं गाँव गया हूँ ,घर पर नहीं हूँ। "यह कह कर वह घर के अन्दर छिप गया। सिपाही के आने पर पत्नी ने वैसा ही कहा ,सुनते ही सिपाही बोला ,"उसे आज ही गाँव जाना था क्या ? राजकुमार को मारने से तो उसे बहुत सारा स्वर्ण और रत्नादि का लाभ होने वाला था। "सिपाही की बात सुन कर चंडाल की पत्नी को धन का लोभ आ गया। वह मुख से तो यही कहती रही कि ये तो गाँव गए हैं परन्तु आँख व हाथ के इशारे से संकेत देने लगी कि ये अन्दर छिपे हैं। इशारा समझ कर सिपाही ने चांडाल को बाहर निकल लिया और राजा के पास ले गया। वहां जाकर चांडाल ने राजा से कहा ,"महाराज आज चतुर्दशी के दिन मैंने किसी भी जीव को न मारने का नियम लिया हुआ है ,मैं आज राजकुमार को नहीं मार सकता। ' राजा ने कहा तुम्हारे जैसे नीच जाति के जीव को भी नियम होता है क्या ? तब चांडाल ने राजा को अपनी एक बात बताई कि एक बार मुझे एक सांप ने डस लिया था जिससे मुझे मृत घोषित करके शमशान में रख दिया। वहां एक रिद्धिधारी जैन दिगंबर मुनि ध्यान कर रहे थे ,उनके शरीर से स्पर्श करी वायु से मैं पुनः जीवित हो गया। मैंने उनके चरणों मैं वंदना करी तो मुनि श्री ने मुझे चतुर्दशी के दिन किसी का वध न करने का नियम दिलवाया। आज वही दिन है अतः राजन आप जो चाहें सो करें पर मैं अपना नियम नहीं तोडूंगा । सब कुछ सुन कर राजा ने कहा ,"तूने मेरी आज्ञा का पालन करने से मना कर मेरी अवज्ञा की है ,मैं तुझे भी दंड देता हूँ । ऐसा कह कर राजा ने आज्ञा दी कि इस चांडाल और राजकुमार बल दोनों को बाँध कर मगरमच्छों वाले तालाब में फिंकवा दो। "राजा की आज्ञा का पालन हुआ। तालाब में फैंकते ही राजकुमार बल को तो मगरमच्छों ने खा लिया परन्तु चांडाल को नहीं खाया क्योंकि उसके नियम की दृढ़ता और धर्मनिष्ठा के कारण जल देवता ने उसे बचा लिया और एक सिहांसन पर बैठा कर तालाब से ऊपर ले आया। सारी प्रजा व राजा यह चमत्कार देख कर हैरान हो गए। देवता ने चांडाल की जय जयकार की। यह देख राजा व सारी प्रजा चांडाल के प्रति नतमस्तक हो गए। राजा ने सम्मान सहित उसे बहुमूल्य उपहार देकर विदा किया।

Thursday, July 16, 2009

सहनशीलता और सेवा -एक मिसाल

राजा उदायन और उसकी रानी प्रभावती बहुत धर्मात्मा ,दानी व सदाचारी थे। उनके ऐसे आचरण से उनकी प्रजा बहुत सुख व समृद्धि का जीवन जी रही थी। राजा में एक ओर विशेष गुण था कि वह किसी की भी सेवा करने में सदा तत्पर रहता था। सेवा में तन - मन व धन सब कुछ सहर्ष अर्पण कर देता था। किसी रोगी की सेवा करने में तो उसे विशेष सुख मिलता था। रोगी की सेवा ,राजा होते हुए भी वह स्वयं अपने हाथों से बिना किसी संकोच व ग्लानी के भावः से ,करके बड़ी शान्ति का अनुभव करता था। एक बार एक जैन दिगम्बर मुनिराज राजा के राज्य में पधारे। उन्हें भयंकर कोढ़ का रोग लगा हुआ था। उनके शरीर से जगह जगह से खून टपक रहा था व दुर्गन्ध भी आ रही थी। ऐसे मुनि को देख कर कोई भी प्रजा का व्यक्ति उनके पास नहीं जा रहा था। यह सूचना राजा तक पहुँची ,सुनते ही राजा स्वयं मुनि राज के दर्शन करने के लिए गया। वहां जाकर पूर्ण भक्ति सहित वंदना कर अपने महल में पधारने व भोजन करने की प्रार्थना की (मुनि श्री का नवधा भक्ति से पढ़गाहन किया )मुनि श्री ने राजा की प्रार्थना स्वीकार की और राजमहल में पहुँच गए। राजा और रानी नें उन्हें पूर्ण विधि सहित भोजनशाला में उच्च आसन दिया व भोजन करवाना शुरू किया ,भोजन करते करते मुनि श्री को वमन (उल्टी) हो गया ,जिससे राजा के सारे वस्त्र ख़राब हो गए ,साथ ही दुर्गन्ध भी उठने लगी। परन्तु राजा व रानी को जरा भी ग्लानी नहीं हुई बल्कि मन ही मन वे सोचने लगे ,"ओह !हमने आहार में न जाने क्या खिला दिया जो मुनिराज को हज़म नहीं हो पाया ,इसी कारण हमारी गलती से वमन हो गया है। " राजा बड़े करुणा भावः से मुनि श्री का शरीर साफ़ करने लगा। रानी नीचे झुक कर फर्श साफ़ करने लगी ,लेकिन तभी मुनि श्री ने फ़िर वमन कर दिया और सारा दुर्गंधित वमन रानी के ऊपर गिर गया। पर देखो -सहनशीलता की पराकाष्ठा व ग्लानी रहित भावना की दृढ़ता। रानी ने एक बार भी मुँह -नाक बंद करके घृणा नहीं की बल्कि दोनों हाथ जोड़ कर मुनि श्री से अपनी अनजाने में हुई गलती की क्षमा मांगने लगे। ऐसी स्थिति को देख कर एक दम एक चमत्कार हुआ। मुनि श्री का रूप बदल कर वहां एक सुंदर वस्त्रों से सुसज्जित देव प्रगट हो गया और राजा और रानी को प्रणाम कर कहने लगा ,"मैं हूँ स्वर्ग का इन्द्र ,आपकी परीक्षा लेने हेतु मुनिराज का रूप धर कर यहाँ आया था। आप दोनों सच मुच महान हैं। मैंने सुना था कि धरती पर आप जैसा सहनशील और सेवा करने वाला व्यक्ति अन्य कोई नहीं यह बात सच मुच सत्य निकली। राजन तुम सदा सब राजाओं में शिरोमणि रहोगे। "ऐसा कह कर इन्द्र स्वर्ग लोक को लौट गया। राजा ने अनेक वर्षों तक सुख पूर्वक राज्य व संसार के सुखों का उपभोग किया। अंत में वैराग्य धारण कर तप साधना द्वारा दीक्षा ग्रहण करके मोक्ष पद को प्राप्त किया।

Monday, July 6, 2009

ब्रह्मचर्य -एक तप

अनंत्मती अत्यन्त रूपवती एवं धार्मिक स्वभाव वाली सेठ प्रियेदत्त की पुत्री थी। सेठ अपनी पत्नि अंग्वती के साथ अपनी पुत्री का लालन पालन बड़े लाड प्यार धार्मिक संस्कारों से कर रहा था। एक बार उनके नगर में आचार्य धर्मकीर्ति जी महाराज का आगमन हुआ। सेठ परिवार सहित दर्शन करने गया। धार्मिक रूचि होने के कारण सेठ ने अष्टमी के दिन से आठ दिन का ब्रह्मचर्य व्रत आचार्य श्री से लिया। उसने मजाक में अपनी बेटी को भी ब्रह्मचर्य का व्रत दिलवा दिया। उस समय अनंत्मती बाल्यावस्था में थी। धीरे -धीरे समय बीतता रहा ,अब पुत्री विवाह योग्य हो गई। अब उसके विवाह की चर्चा होने लगी। अनंत्मती ने पिता से कहा ,"पिता जी आप मेरे विवाह की बात कसे कर रहे हैं ?आपने तो मुझे ब्रह्मचर्य का व्रत दिलवाया था। " सेठ ने कहा ,"वह व्रत तो मैंने तुमहें मजाक में मात्र आठ दिन के लिए दिलवाया था।" अनंत्मती नें कहा ,"पर आचार्य श्री ने मेरे लिए ऐसा कुछ नहीं कहा था अतः मैंने तो अब विवाह करने का व्रत ले लिया है।"माता पिता के बहुत समझाने पर भी अनंत्मती अपना नियम तोड़ने को तैयार नहीं हुई। माता पिता को बड़ा दुःख हुआ परन्तु बेटी के व्रत व् दृड़ निश्चेय के आगे उनकी एक चली। एक दिन अनंत्मती अपने घर के बगीचे में झूला झूल रही थी इतने में आकाशमार्ग से एक विद्याधरों का राजा सुकेशी अपनी पत्नी सहित विमान में बैठा जा रहा था। उसकी नज़र रूपवती अनंत्मती पर पड़ी -देखते ही वह उस पर मोहित हो गया और उसे पाने की तीव्र इच्छा उसमे जागृत हो गई। शीघ्र ही नीचे आकर अनंत्मती का हरण कर उसे विमान में बैठा लिया। यह सब देख उसकी पत्नी बहुत नाराज़ होने लगी। उसकी नाराज़गी इतने अधिक क्रोध में बदल गई की राजा नें अनंत्मती को रस्ते में एक जंगल में छोड़ दिया। जंगल में अनंत्मती बड़ी परेशान बठी थी कि इतने में वहां भीलों का राजा शिकार के लिए आया अनंत्मती के रूप प्रभावित हो उसे अकेली देख अपने साथ ले गया। घर ले जाकर कहने लगा," में तुम्हें अपनी प्रधान रानी बना दूँगा तुम मुझसे विवाह कर लो " अनंत्मती के मना करने पर वह उसके साथ जबरदस्ती करने लगा। अनंत्मती प्रभु का ध्यान कर अपने बचाव की प्रार्थना करने लगी। उसकी निर्मल सच्ची भावना से प्रभावित हो वहां वन देवता प्रगट हो गया और उसने उस भील की बहुत पिटाई की जिससे राजा भील बहुत डर गया और कहने लगा ,"यह तो कोई देवी प्रतीत होती है "ऐसा जान कर उसने अनंत्मती को एक बंजारे के साथ भेज दिया रस्ते में बंजारे का मन भी अनंत्मती को देख कर उससे विवाह करने को हो गया उसने अनेक प्रकार से उसे मानाने की कोशिश की परन्तु अनंत्मती किसी भी लोभ डर से प्रभावित नहीं हुई। बंजारे ने क्रोधित होकर उसे कामसेना नाम की एक मशहूर वैश्या को बेच दिया कामसेना अनंत्मती के रूप को देख कर बड़ी प्रसन्न हुई और सोचने लगी इससे में बहुत धन प्राप्त करुँगी , उसने कुछ दिन अनंत्मती को बड़े प्यार से अपने पास रखा। एक रात वहां का राजा वैश्या के पास आया। कामसेना नें अनंत्मती को बिना बताए राजा को उसके कमरे में भेज दिया। राजा अनंत्मती के रूप को देख बड़ा प्रसन्न हुआ। जैसे ही वह उसे हाथ लगाने लगा अनंत्मती उससे दूर हट अपने प्रभु का ध्यान करने लगी। अनंत्मती तो सच्ची शीलव्रती थी ,उसका निश्चेय अत्यन्त दृढ़ था। उसके शील व्रत से प्रभावित हो कर एक देवता सर्प रूप में वहां प्रगत हुआ राजा को डसने लगा। यह देख राजा डर कर चिल्लाने लगा इधर -उधर भागने लगा। वैश्या इस उपद्रव से बहुत घबरा गई और उसने अनंत्मती को अपने घर से बाहर निकल दिया। अब अनंत्मती अकेली उदास एक स्थान पर बैठी थी ,तभी अचानक उसी रास्ते से कमलश्री नाम की एक साध्वी (आर्यिका )विहार करती हुई जा रही थी। उन्हें देख अनंत्मती एकदम उठी उनके दर्शन करने लगी। अनंत्मती नें अपनी स्थिति साध्वी को बताई तो उन्होनें उसे अपने साथ चलने को कहा। अनंत्मती अब उनके साथ ही रहने लगी उनकी सेवा में अपना समयं व्यतीत करने लगी। एक दिन अनंत्मती के माता पिता वहां साध्वी जी के दर्शन करने आए। उनकी नज़र वहां अपनी पुत्री पर पड़ी ,उसे देखते ही दोनों ने उसे गले से लगा लिया और उसे घर चलने को कहा -परन्तु उसने विनय पूर्वक साध्वी श्री के चरणों में दीक्षित होने की आज्ञा मांगी। उन्होंने संसार की असारता के बारे में सब को बताया। अंत में दोनों से सहमति ले अनंत्मती को दीक्षा दे दी। संघ में रहकर उसने बहुत तप-त्याग द्वारा समाधिमरण किया 16 वें स्वर्ग में स्थान पाया।यह है दृड़ शीलव्रत का प्रभाव।