Wednesday, August 12, 2009

आंतरिक भावों की समीक्षा


एक बार छः मित्र पिकनिक मनाने निकलेसुहावना मौसम था। चारों और प्रकृति अपनी अपार सुन्दरता बिखेर रही थीसभी मित्र हँसते ,गुनगुनाते मस्ती में प्रकृति का आंनंद लेते चले जा रहे थेअचानक वे खुशी से झूम उठे और बोले ," हा हा हा कितना सुंदर आम का वृक्ष है !वाह- वाह काम बन गया ,अब तो जी भरकर आम खायेंगे ,खूब मज़ा आयेगाआम से लदे वृक्ष को देख कर छहों मित्रों के मन में अलग -अलग विचार उठने लगेउनमें से एक कहीं से एक कुल्हाडी उठा लाया और उसे लेकर वह वृक्ष पर चढ़ गया और आमों से लदफ़द एक टहनी को काटने लगायह देख दूसरा मित्र उसकी मूर्खता पर हंसने लगा और बोला ,"अरे मूर्ख !क्यों अपना परीश्रम व्यर्थ खोता है ?इस टहनी से ज़्यादा तो इस बड़े टहने में सैंकडों आम लगे हैं ,एक बार इसे नीचे गिरा लो ,फ़िर जी भरकर खाओ और साथ में घर भी बाँध कर ले जाओ। "यह बात सुन कर तीसरा मित्र अपनी हँसी रोक सका औरबोला ,"अरे भोले भाई !यदि आम घर भी ले जाने हैं तो नीचे मैं तुझे ओर भी सरल उपाय बताता हूँवृक्ष पर चढ़ने से तो चोट लगने का भी खतरा हैनीचे खड़े होकर वृक्ष को जड़ से ही काट डालो ,सारा वृक्ष ही गिर जाएगा फ़िर आराम से पेट भर कर खा भी लेंगे और घर भी ले जायेंगेऔर हाँ भइया !मैं तो बैलगाड़ी भर कर सारा ही वृक्ष लाद कर घर ले जाऊँगाकई दिन तो आम खाऊँगा और साल भर इंधन में रोटी पकाऊंगा। बैलगाडी वाला अधिक से अधिक 100-200 रुपए ही तो लेगा। "ऐसा कह कर वह वृक्ष को जड़ से उखाड़ने के लिए कुल्हाडी चलाने लगा । शेष तीन मित्र यह सब देख मन ही मन सोचने लगे कि बेकार ही आए इन दुष्ट मित्रों के साथ। जिसका फल खायेंगे उसको ही जड़ से काट डालेंगे !धिक्कार है ऐसी कृतघ्नता को। प्रभु ही इन्हें सदबुद्धि प्रदान करें ।
साहस बटोर कर उनमें से एक बोला ,"ठहरो !पहले मेरी बात सुन लो फ़िर वृक्ष काटना। एक बार एक शेर दलदल में फंस गया बेचारा लाचार हो गया। जिसकी एक दहाड़ से सारा जंगल काँपता था वह बेचारा भगवान से प्रार्थना कर रहा है कि एक बार बचा लो फ़िर मैं किसी को नहीं मारूंगा ,घास पत्ते खा कर जी लूँगा। प्रभु का नाम कभी व्यर्थ नहीं जाता ,तभी एक पथिक वहां से गुजरा और शेर की हालत देख कर उस पे दया करके उसे दलदल से बाहर निकाल देता है और मन में सोचता है कि शेर उसका उपकार मानेगा। परन्तु शेर बाहर आते ही उसे कहता है कि मैं तुझे खा जाऊंगा। यह सुन पथिक घबरा जाता है और प्रभु को याद करता है ,फलस्वरूप उसे एक विचार आता है और वह शेर से कहता है कि मैंने तो तुझे बचाया और तू मुझे ही खा जाएगा !शेर बोला ,"दुनिया का ऐसा ही व्यवहार है। "पथिक बोला ,"अच्छा भाई ,किसी से न्याय करा लेते हैं। व्यवहार कुशल शेर ने यह बात सहर्ष स्वीकार कर ली क्योंकि उसे विश्वास था कि न्याय उसके विरुद्ध न जा सकेगा क्योंकि वह जानता था कि मनुष्य से अधिक कृतघनी संसार में कोई नहीं है। दोनों एक वृक्ष के पास पहुंचे और उसे सारी बात बताई। वृक्ष बोला ,"शेर ठीक है क्योंकि मनुष्य गर्मी से परेशान होकर मेरे साये में विश्राम करता है ,मेरे फलों को खाता है ,फ़िर भी जाते हुए मेरी टहनी तोड़ कर ले जाता है उसे चूल्हे में जलाता है। अतः इस कृत्घनी के साथ ऐसा ही व्यवहार होना चाहिए । पथिक निराश होकर आगे चला तो एक गाय मिली उसको भी अपनी कथा सुनाई । गाय भी पथिक के ही विरुद्ध बोली। कहने लगी ,"मैंने जवानी में अपने बच्चों का पेट काट कर मनुष्य की संतान को दूध पिलाया परन्तु बूढी होने पर इस निर्दयी ने मेरा उपकार भुला ,मुझे कसाई को बेच ,मेरी खाल खिंचवा कर जूता बनवा कर पाँव में पहन लिया। ऐसे कृत्घनी के साथ ऐसा ही व्यवहार उचित है। निर्णय पाकर शेर पथिक को खा गया। इस लिए मित्रों विवेक से काम लो और जैसे तुम दूसरे की कृतघ्नता को देखते हो वैसे ही अपनी भी देखो।जिस वृक्ष के तुम आम खाओगे उसी पर कुल्हाडी चलाते क्या तुम्हारा हृदय नहीं काँप रहा ?मैं तुम्हारे पाँव पड़ता हूँ तुम सब नीचे उतर आओ। मैं स्वयं वृक्ष पर चढ़ कर तुम्हें भर पेट आम खिला दूँगा। ऐसा कह कर वह ऊपर चढ़ गया और आम के बड़े -बड़े गुच्छे तोड़ कर नीचे डालने लगा। यह देख नीचे खड़ा एक मित्र बोला ,"मित्र !तुम्हें भी पूरा विवेक नहीं ,देख नहीं रहे हो ,जिस गुच्छे को तोड़ कर तुम नीचे फैंक रहे हो उसमे पके हुए आमों के साथ -साथ कच्चे आम भी टूट रहे हैं। यह कच्चे आम कुछ दिन में पक जाते और किसी अन्य व्यक्ति के खाने में काम आ जाते परन्तु अब तो तुमने ये व्यर्थ कर दिए हैं। ये न तो अब तुम्हारे काम आएंगे न किसी अन्य के। तुम अब नीचे उतर आओ मैं तुम सबको ऊपर चढ़ कर एक -एक पका हुआ मीठा आम खिलाता हूँ। यह कह कर वह वृक्ष पर चढ़ गया और चुन -चुन कर एक -एक मीठा आम तोड़ कर नीचे गिराने लगा।
छठा मित्र नीचे खड़ा अब तक यह सब दृश्य देख रहा था परन्तु चुप था। क्या बोले ?किस -किस को समझाए ?उस की संतोष पूर्ण सोच को स्वीकार करने वाला यहाँ था ही कौन ?विद्वान लोग मूर्खों को उपदेश नहीं देते क्योंकि एक दिन की बात है बहुत ज़ोर से वर्षा हो रही थी। वृक्ष के नीचे कुछ बन्दर ठिठुरे बैठे थे। उसी वृक्ष पर कुछ बयों ने घोंसले बना रखे थे और आनंद से प्रकृति का मज़ा ले रहे थे। बंदरों की हालत देख कर वे हँसते हुए बोले ,"मूर्ख बन्दर तुम्हें भगवान् ने दो हाथ दिए हैं फ़िर भी तुम अपना घर क्यों नहीं बनाते ?देखो हम छोटे -छोटे पक्षी भी कितने सुंदर घोंसलों में रहते हैं। क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती ?बस इतना सुनते ही बंदरों ने गुस्से में वृक्ष पर चढ़ कर सब बयों के घोंसले तोड़ दिए और उनके अंडे भी फोड़ दिए। ऐसा सोच कर वह संतोषी व्यक्ति कुछ न बोला और पृथ्वी पर पहले से इधर -उधर बिखरे पड़े हुए पके आमों को उठा कर पृथक बैठ सुख पूर्वक खाने लगा।
इस उदाहरण से व्यक्ति की इच्छाओं की तीव्रता व् मंदता का सुंदर परिचय मिलता है। इसी प्रकार अपने आंतरिक भावों का दर्शन करते हुए तीव्र भावों से पीछे हटते हुए मंद्तम भावों पर अर्थात पहले मित्र के भावों से छठे मित्र के भावों तक आने के क्रम में ही सार्थकता है और इसी में ही कल्याण है --------यही धर्म है।
इसी तरह मन में उठ रहे भावों को हमें पढ़ना होगा और देखना होगा अपने भीतर ,ठीक -ठीक पहचानना होगा अपने भीतर। खाते -नहाते -चलते -सोते हर समय जागरूक रहना होगा अपने भीतर। देखते रहना होगा प्रतिक्षण अपने मन एवं बुद्धि को कि क्या कुछ विचार रहे हैं ये ?क्या जाल बुन रहे हैं ये ?प्रतिक्षण समझना होगा ताकि हम भटकने पायें।
यही होगी हमारी आंतरिक साधना -----------------!

1 comment:

  1. Hi

    Congratulations !!! You are now on the WEB !!! The stories are good. I had some difficulty initially as the Roman script is not easy to read. But I will get used to it.

    Love and regards
    kulraj

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