Monday, July 6, 2009
ब्रह्मचर्य -एक तप
अनंत्मती अत्यन्त रूपवती एवं धार्मिक स्वभाव वाली सेठ प्रियेदत्त की पुत्री थी। सेठ अपनी पत्नि अंग्वती के साथ अपनी पुत्री का लालन पालन बड़े लाड प्यार व धार्मिक संस्कारों से कर रहा था। एक बार उनके नगर में आचार्य धर्मकीर्ति जी महाराज का आगमन हुआ। सेठ परिवार सहित दर्शन करने गया। धार्मिक रूचि होने के कारण सेठ ने अष्टमी के दिन से आठ दिन का ब्रह्मचर्य व्रत आचार्य श्री से लिया। उसने मजाक में अपनी बेटी को भी ब्रह्मचर्य का व्रत दिलवा दिया। उस समय अनंत्मती बाल्यावस्था में थी। धीरे -धीरे समय बीतता रहा ,अब पुत्री विवाह योग्य हो गई। अब उसके विवाह की चर्चा होने लगी। अनंत्मती ने पिता से कहा ,"पिता जी आप मेरे विवाह की बात कसे कर रहे हैं ?आपने तो मुझे ब्रह्मचर्य का व्रत दिलवाया था। " सेठ ने कहा ,"वह व्रत तो मैंने तुमहें मजाक में मात्र आठ दिन के लिए दिलवाया था।" अनंत्मती नें कहा ,"पर आचार्य श्री ने मेरे लिए ऐसा कुछ नहीं कहा था अतः मैंने तो अब विवाह न करने का व्रत ले लिया है।"माता पिता के बहुत समझाने पर भी अनंत्मती अपना नियम तोड़ने को तैयार नहीं हुई। माता पिता को बड़ा दुःख हुआ परन्तु बेटी के व्रत व् दृड़ निश्चेय के आगे उनकी एक न चली। एक दिन अनंत्मती अपने घर के बगीचे में झूला झूल रही थी इतने में आकाशमार्ग से एक विद्याधरों का राजा सुकेशी अपनी पत्नी सहित विमान में बैठा जा रहा था। उसकी नज़र रूपवती अनंत्मती पर पड़ी -देखते ही वह उस पर मोहित हो गया और उसे पाने की तीव्र इच्छा उसमे जागृत हो गई। शीघ्र ही नीचे आकर अनंत्मती का हरण कर उसे विमान में बैठा लिया। यह सब देख उसकी पत्नी बहुत नाराज़ होने लगी। उसकी नाराज़गी इतने अधिक क्रोध में बदल गई की राजा नें अनंत्मती को रस्ते में एक जंगल में छोड़ दिया। जंगल में अनंत्मती बड़ी परेशान बठी थी कि इतने में वहां भीलों का राजा शिकार के लिए आया अनंत्मती के रूप स प्रभावित हो उसे अकेली देख अपने साथ ले गया। घर ले जाकर कहने लगा," में तुम्हें अपनी प्रधान रानी बना दूँगा तुम मुझसे विवाह कर लो "। अनंत्मती के मना करने पर वह उसके साथ जबरदस्ती करने लगा। अनंत्मती प्रभु का ध्यान कर अपने बचाव की प्रार्थना करने लगी। उसकी निर्मल व सच्ची भावना से प्रभावित हो वहां वन देवता प्रगट हो गया और उसने उस भील की बहुत पिटाई की जिससे राजा भील बहुत डर गया और कहने लगा ,"यह तो कोई देवी प्रतीत होती है "ऐसा जान कर उसने अनंत्मती को एक बंजारे के साथ भेज दिया रस्ते में बंजारे का मन भी अनंत्मती को देख कर उससे विवाह करने को हो गया उसने अनेक प्रकार से उसे मानाने की कोशिश की परन्तु अनंत्मती किसी भी लोभ व डर से प्रभावित नहीं हुई। बंजारे ने क्रोधित होकर उसे कामसेना नाम की एक मशहूर वैश्या को बेच दिया कामसेना अनंत्मती के रूप को देख कर बड़ी प्रसन्न हुई और सोचने लगी इससे में बहुत धन प्राप्त करुँगी , उसने कुछ दिन अनंत्मती को बड़े प्यार से अपने पास रखा। एक रात वहां का राजा वैश्या के पास आया। कामसेना नें अनंत्मती को बिना बताए राजा को उसके कमरे में भेज दिया। राजा अनंत्मती के रूप को देख बड़ा प्रसन्न हुआ। जैसे ही वह उसे हाथ लगाने लगा अनंत्मती उससे दूर हट अपने प्रभु का ध्यान करने लगी। अनंत्मती तो सच्ची शीलव्रती थी ,उसका निश्चेय अत्यन्त दृढ़ था। उसके शील व्रत से प्रभावित हो कर एक देवता सर्प रूप में वहां प्रगत हुआ व राजा को डसने लगा। यह देख राजा डर कर चिल्लाने लगा व इधर -उधर भागने लगा। वैश्या इस उपद्रव से बहुत घबरा गई और उसने अनंत्मती को अपने घर से बाहर निकल दिया। अब अनंत्मती अकेली उदास एक स्थान पर बैठी थी ,तभी अचानक उसी रास्ते से कमलश्री नाम की एक साध्वी (आर्यिका )विहार करती हुई जा रही थी। उन्हें देख अनंत्मती एकदम उठी व उनके दर्शन करने लगी। अनंत्मती नें अपनी स्थिति साध्वी को बताई तो उन्होनें उसे अपने साथ चलने को कहा। अनंत्मती अब उनके साथ ही रहने लगी व उनकी सेवा में अपना समयं व्यतीत करने लगी। एक दिन अनंत्मती के माता पिता वहां साध्वी जी के दर्शन करने आए। उनकी नज़र वहां अपनी पुत्री पर पड़ी ,उसे देखते ही दोनों ने उसे गले से लगा लिया और उसे घर चलने को कहा -परन्तु उसने विनय पूर्वक साध्वी श्री के चरणों में दीक्षित होने की आज्ञा मांगी। उन्होंने संसार की असारता के बारे में सब को बताया। अंत में दोनों से सहमति ले अनंत्मती को दीक्षा दे दी। संघ में रहकर उसने बहुत तप-त्याग द्वारा समाधिमरण किया व 16 वें स्वर्ग में स्थान पाया।यह है दृड़ शीलव्रत का प्रभाव।
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kahani aacchi hai.........
ReplyDeletekabhi mere blog per bhi aaeye
http://lyricsgirish.blogspot.com/
achha laga !
ReplyDeletenice one.narayan narayan
ReplyDeleteBahut sundar rachana..really its awesome...
ReplyDeleteRegards..
DevSangeet
अच्छी कहानी है पर लगता है मनो अधूरी है। जैन कहानियां बहुत पढ़ी है और उम्मीद है कि आपके ब्लॉग से और भी पढ़ने को मिलेगी।
ReplyDeleteधन्यवाद
जय जिनेन्द्र
हिंदी भाषा को इन्टरनेट जगत मे लोकप्रिय करने के लिए आपका साधुवाद |
ReplyDeleteबहुत सुंदर…..आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्लाग जगत में स्वागत है…..आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्त करेंगे …..हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।
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