Monday, June 29, 2009

दृड़ निशचय-सफलता का आधार

जिनदत नामक एक सेठ बड़ा धर्मात्मा और जिनेन्द्र भगवान में अटूट श्रद्धा रखने वाला था। वह नित्यप्रति पूजा -पाठ,दान ,दया व गरीबों की सेवा आदि अनेक सद्कर्मों से जीवन यापन करता था। उसकी इस अटूट श्रद्धा व् गुणों की स्वर्गों में भी चर्चा होती थी। एक दिन दो देवों ने उस सेठ की परीक्षा करने की ठानी। वे दोनों रूप बदल कर धरती पर आए और अनेक प्रकार के प्रलोभन द्वारा तथा भंयकर उपसर्गों द्वारा उसकी श्रद्धा को तोड़ने का प्रयास किया परन्तु जिनदत किसी भी प्रकार से विचलित न हुआ। अंत में हारकर दोनों देव अपने स्वरुप में प्रगट हुए व् जिनदत सेठ की प्रशंसा की तथा उसे आकाशगामिनी विद्या प्रदान की। साथ ही यह भी कहा कि जिनेन्द्र भगवान में श्रद्धा बढाने हेतु तुम इस विद्या को किसी अन्य व्यक्ति को भी दे सकते हो। इस विद्या को पाकर जिनदत अब और अधिक प्रभु भक्ति में लग गया क्योंकि अब वह हररोज़ आकाशमार्ग द्वारा सुमेरु पर्वत पर स्थित जिनेन्द्र भगवान के सुवर्णमय अकृत्रिम चैताल्यों के दर्शन व् पूजन -पाठ करने लगा। यह सौभाग्य किसी अत्यन्त पुण्यशाली जीव को ही मिल सकता है। वह लगातार इस क्रम से अपने पुण्यों को व् प्रभु के प्रति श्रधान को बढाने लगा। एक दिन जब सेठ जाने को तैयार खड़ा था तो वहाँ एक सोमदत्त नाम का माली आया उसने जिनदत्त से वह विद्या प्रदान करने की प्रार्थना की। सोमदत्त की भक्ति व् पवित्रता को देखकर जिनदत्त ने उसे विद्या साधने की रीति बता दी और कहा कि चतुर्दशी की रात को बड़ वृक्ष की डाली में एक छींका(रस्सियों से बंधी टोकरी ) बाँध लो और उसके नीचे भंयकर तीखे -तीखे शस्त्र सीधे मुंह गाढ़ दो उसके बाद छींके में बैठकर निशंक भाव से णमोकार मंत्र का जाप करो। जाप करते -करते छींके के उपर बंधी रस्सी काट दो यदि जिनदेव में अटुट श्रद्धा होगी तो उसी समय छींका नीचे नहीं गिरेगा और आकाशगामिनी विद्या सिद्ध हो जायेगी और यदि श्रद्धा नहीं होगी तो नीचे खड़े शस्त्रों से तुम्हारी मौत हो जायेगी। सोमदत्त इस विद्या को साधने लगा परन्तु उससे विद्या सध नहीं रही थी क्योंकि उसे अपनी मौत का भय लग रहा था। वह छींके के पास जाता और फिर डरकर वापिस आ जाता था। उसी समय मनिकांजन नामक एक सुन्दर वैश्या ने अपने से अटुट प्रेम करने वाले अंजन नामक चोर से कहा मुझे यहाँ की महारानी के गले का वो सुन्दर रत्नजडित हार चाहिए जो अत्यन्त सुन्दर व् अनमोल है। यदि तुम मुझे वो हार लाकर दोगे तभी मैं तुमसे प्यार करुँगी। अंजन चोर,पक्का चोर तो था ही,साथ ही हड़ निश्चयी भी था जिस काम को करने की ठान लेता वह करके ही छोड़ता था। अतः उसी समय उसने वह हार चुराने का निर्णय लिया व् राजमहल में पहुँच कर बड़ी चतुराई से हार चुरा लिया और राजमहल से चलने लगा परन्तु उस हार में एक अद्वित्य विशेषता थी। वह यह है कि उसकी अपूर्व चमक किसी चीज से भी रूकती नहीं थी। अतः उस चमक के कारण सिपाहिओं को चोरी का पता लग गया। वे अंजन चोर को पकड़ने उसके पीछे दौड़ने लगे। अंजन चोर दौड़ता हुआ काफी दूर निकल गया पर पीछे सिपाही लगातार चले आ रहे थे। इसी बीच अंजन चोर वहां पहुँच गया जहाँ सोमदत्त माली आकाशगामिनी विद्या को साधने की कोशिश कर रहा था। अंजन चोर ने उससे पूछा यह क्या कर रहे हो ? सब कुछ पता लगने पर अंजन ने सोचा -अब सिपाही मुझे पकड़ लेगें और राजा प्राण दंड देगा इससे बचने का तो बस यही उपाय है आकाशगामिनी विद्या यदि मैं साध लूँ तो आकाश में उड़ जाऊंगा एक तो मौत से बच जाऊँगा दुसरे प्रभु के दर्शन भी होंगें। उसने छींके में बैठने से पहले णमोकार मंत्र पूछ लिया -जैसे ही छींके में जाकर बैठा तो विश्वास तो पूरा था कि इस क्रिया से मुझे सिधि अवश्य मिलेगी परन्तु मंत्र क्या था ?वह भूल गया तब भी बोलने लगा "आनम-तानम सेठ शब्द सत्य प्रमाणम् इसी का जाप करते हुए उसने निशंक होकर छींका काट दिया। छींका नीचे गिरने लगा पर अंजन चोर जरा भी नहीं भयभीत हुआ एकदम आकाशगामिनी की विद्या उसे सिद्ध हो गई और देखते ही देखते अंजन चोर आकाश में उड़ गया और विद्या देने वाले देव अंजन चोर को सुमेरु पर्वत पर ले गए जहाँ सुवर्णमय अकृत्रिम चैतालय बने हुए थे जिन्हें देखते ही वैराग्य उत्पन्न हो जाता है यहाँ तक कि सम्यग्दर्शन तक की प्राप्ति हो जाती हैं। वहां जिनदत्त सेठ भी पूजा कर रहा था। अंजन चोर ने वहां विराजमान मुनिराज के चरणों में विनय सहित परणाम किया और दीक्षा ग्रहण करने के भाव प्रकट किए। मुनिराज ने उसके पक्के निश्चय को देखकर उसे दीक्षा दे दी। कठोर तप द्वारा कर्मों का नाशकर उसने मोक्ष पद को प्राप्त किया।
शिक्षा -मुक्ति का द्वार सभी के लिए खुला हैं चाहे वह कोई भी व्यक्ति हो।

4 comments:

  1. mautarma (md)likhti rahiye is tarh ki bodh kathaayen (pl continue with such anecdots,these are very educative),yes every body can improve ,and overstep prev karmas,and has liberty to act.where there is a will there is a way .veerubhai1947.blogspot .com(veerubhai1947@gmail.com)

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  2. Kafi achi kahani lagi. Ase laga jaise kabhi dadi ya nani ji sunati thi... Dhanywad....

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  3. aap Hisar se ho ye jankar or bhi prashanta hui...
    Main bhi Hisar se hun...

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  4. ye kahani bhot inspiring h.or b kahani likhte rehna taki hum inko pad kr hum or gyan prapt kr sake..........

    jai jinnender

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