Saturday, July 18, 2009
इंसान जन्म से नहीं -कर्म से महान होता है
राजा महाबल धार्मिक उत्सवों को बड़ी धूम धाम से मनाया करता था। नन्दीश्वर पर्व में अष्टमी के दिन राजा ने घोषणा करवाई कि आज से आठ दिन तक कोई भी किसी जीव की हिंसा नहीं करेगा। अगर कोई ऐसा करेगा तो उसे प्राण दंड दिया जाएगा। उस राजा का पुत्र कुमारबल मॉस खाने का आदि था। उससे आठ दिन तक मॉस खाए बिना नहीं रहा गया अतः एक दिन अपने बगीचे में छिप कर एक बकरे को मरवा कर तथा पकवा कर उसने खा लिया। बगीचे का माली उस समय पेड पर चढा हुआ था। उसने यह सब देख लिया और राजा को सारीबात बता दी। राजा को बहुत क्रोध आया कि मेरी आज्ञा की मेरे ही बेटे ने अवहेलना की है। घोषणा के अनुसार राजा ने अपने बेटे बल कुमार को प्राण दंड की सज़ा सुनाई। बल कुमार को मृत्युदंड के स्थान पर ले जाया गया और चांडाल को बुलाने के लिए एक सिपाही उसके घर गया। चांडाल को सारी सूचना मिल गई थी उसने अपनी पत्नी से कहा ,"सिपाही से कह देना मैं गाँव गया हूँ ,घर पर नहीं हूँ। "यह कह कर वह घर के अन्दर छिप गया। सिपाही के आने पर पत्नी ने वैसा ही कहा ,सुनते ही सिपाही बोला ,"उसे आज ही गाँव जाना था क्या ? राजकुमार को मारने से तो उसे बहुत सारा स्वर्ण और रत्नादि का लाभ होने वाला था। "सिपाही की बात सुन कर चंडाल की पत्नी को धन का लोभ आ गया। वह मुख से तो यही कहती रही कि ये तो गाँव गए हैं परन्तु आँख व हाथ के इशारे से संकेत देने लगी कि ये अन्दर छिपे हैं। इशारा समझ कर सिपाही ने चांडाल को बाहर निकल लिया और राजा के पास ले गया। वहां जाकर चांडाल ने राजा से कहा ,"महाराज आज चतुर्दशी के दिन मैंने किसी भी जीव को न मारने का नियम लिया हुआ है ,मैं आज राजकुमार को नहीं मार सकता। ' राजा ने कहा तुम्हारे जैसे नीच जाति के जीव को भी नियम होता है क्या ? तब चांडाल ने राजा को अपनी एक बात बताई कि एक बार मुझे एक सांप ने डस लिया था जिससे मुझे मृत घोषित करके शमशान में रख दिया। वहां एक रिद्धिधारी जैन दिगंबर मुनि ध्यान कर रहे थे ,उनके शरीर से स्पर्श करी वायु से मैं पुनः जीवित हो गया। मैंने उनके चरणों मैं वंदना करी तो मुनि श्री ने मुझे चतुर्दशी के दिन किसी का वध न करने का नियम दिलवाया। आज वही दिन है अतः राजन आप जो चाहें सो करें पर मैं अपना नियम नहीं तोडूंगा । सब कुछ सुन कर राजा ने कहा ,"तूने मेरी आज्ञा का पालन करने से मना कर मेरी अवज्ञा की है ,मैं तुझे भी दंड देता हूँ । ऐसा कह कर राजा ने आज्ञा दी कि इस चांडाल और राजकुमार बल दोनों को बाँध कर मगरमच्छों वाले तालाब में फिंकवा दो। "राजा की आज्ञा का पालन हुआ। तालाब में फैंकते ही राजकुमार बल को तो मगरमच्छों ने खा लिया परन्तु चांडाल को नहीं खाया क्योंकि उसके नियम की दृढ़ता और धर्मनिष्ठा के कारण जल देवता ने उसे बचा लिया और एक सिहांसन पर बैठा कर तालाब से ऊपर ले आया। सारी प्रजा व राजा यह चमत्कार देख कर हैरान हो गए। देवता ने चांडाल की जय जयकार की। यह देख राजा व सारी प्रजा चांडाल के प्रति नतमस्तक हो गए। राजा ने सम्मान सहित उसे बहुमूल्य उपहार देकर विदा किया।
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इस कथा के माध्यम से आपने जिस गहरी बात को समझाने का प्रयास किया है. उसके लिए साधुवाद स्वीकारें........
ReplyDeleteतथ्य की रुचि और साधुवाद के लिए धन्यवाद।
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